2014, Essay, New Delhi, Single Man

The Inimitable Ravish Kumar on Single Man

Bihariyat Via Angreziyat: Daastan-e-Single Man:

“The imposition of emergency had beckoned a new genre of books into the room, studies of Adolf hitler and nazism-William L Shirer’s The rise and fall of the Third Reich, Albert sower’s Inside the Third Reich, Joachim C Fest’s biography of Hitler, the diaries of Joseph Goebbels, Men Kampf. Indira Gandhi was being studied as a symptom of fascism” 

संकर्षण ठाकुर की क़लम इतिहास पर साहित्य की तरह चलती है । उनकी अंग्रेज़ी में कोई आक्सफोर्ड वाला बिहारी मानस की आहट सुनते हुए इस उलझन में पड़ सकता है कि क्या बिहार को भी अंग्रेज़ी में बयां किया जा सकता है । मैं ख़ुद मानता रहा हूँ कि बिहारियत अंग्रेज़ी में नहीं कहीं जा सकती । कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनके बिना आप बात तो कह सकते हैं मगर बिहारी मानस की परतों को नहीं खोल सकते । संकर्षण की अंग्रेज़ीयत बिहारियत को दोनों विलियमों शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ के अंदाज़ में पेश करती है । वर्डस्वर्थ और शेक्यपीयर को 1985 और 1986 के साल में पढ़ा था । जब मैं नौवीं दसवीं में था । वो भी जब हमारी टीचर इंदिरा शांडील्य ने अंग्रेजी में पढ़ाने की ज़िद की तो हम हिन्दी मीडियम वाले गिड़गिड़ाने लगे कि कुछ्छो नहीं बुझाता है । के के पांडे भी तंग आ जाते थे अंग्रेज़ी को हिन्दी पढ़ाने में । मैंने शेक्सपीयर को हिन्दी में पढ़ा है । यहाँ यह बताना ज़रूरी था ताकि आप मेरे बारे में भ्रम न पाल लें कि मैं कहीं शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ की भाषा का ज्ञाता तो नहीं जो अंग्रेज़ी अख़बार द टेलिग्राफ़ के बंजारा संपादक ( रोविंग एडिटर) संकर्षण की बिहारियत वाया अंग्रेजीयत को बांच रहा हूँ ।
सिंगल मैन – द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार । जिस तरह से हार्पर कोलिन्स ने किताब के कवर पर सिंगल मैन को बड़ा छापा है उससे लगता है कि यह नीतीश कुमार की कोई जीवनी है । लेकिन यह किताब पूरी तरह से वो कहती है जिसे प्रकाशक ने छोटे हर्फो में छापा है । द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार ।
इस किताब में ख़ुद संकर्षण आपातकाल और जयप्रकाश आंदोलन के दौर को याद करते हुए बड़े हो रहे हैं । वो दौर लेखक के बचपन का था । उनके पिता जनार्दन ठाकुर सम्मानित और बारीक पत्रकार थे । नीतीश के बिहार को समझने को समझने के लिए बिहार को जानना ज़रूरी है । लेखक नीतीश के बिहार को लेकर शुरू के साठ पन्नों में कोई ख़ास उत्साहित नहीं हैं मगर वे ‘बिहार ना सुधरी’ से ‘बदल गया बिहार’ के बीच यहाँ के मानस की मनोवैज्ञानिक सहूलियतों को पकड़ रहे हैं । आँध्र प्रदेश में तीन सौ इंजीनियरिंग कालेज हैं मगर बिहार में दस । कुछ दंबगों के किस्से हैं जो बिहार के इस दौर में जीवाश्म में बदल रहे हैं । एक सज्जन कहते हैं कि हमारे ये गार्ड लालू के समय की निरंतरता हैं मगर अब कोई इनके साथ मुझे देखता है तो हैरान हो जाता है कि जब ज़रूरत नहीं तो क्यों रखे हैं ।
संकर्षण ने नीतीश को एक अणे मार्ग में रहने वाले नीतीश में नहीं ढूँढा है । बल्कि ख़ुद के साथ उन गाँवों क़स्बों और ज़िलों में देखा है जहाँ कई तरह के बिहार हैं जिन्हें आप सिर्फ बदलाव और यथास्थिति के खाँचे में बाँट कर नहीं देख सकते । नया बिहार या बिहारी पहचान में राजनीतिक गर्व का भाव भरने वाले नीतीश की उम्मीदों को आशंका की नज़र से देखते हुए संकर्षण शायद उन परकोटों को ढूँढ रहे हैं जहाँ से कोई कूद कर इस बिहारी पहचान को फिर से अलग अलग जाति की पहचान से बाँट सकता है । अपर कास्ट नीतीश के अगेंस्ट चला गया है , मैं जब भी पटना फ़ोन करता हूँ ये लाइन सुनाई देती है ।संकर्षण कहते हैं कि यह बँटवारा तो नीतीश ने भी किया । पसमांदा मुसलमान, अति पिछड़ा और अति दलित । इस सवाल के जवाब में नीतीश कहते हैं कि विकास और पहचान की राजनीति में कोई अंतर्विरोध नहीं होता है ।
इस किताब का पहला चैप्टर मेरा प्रिय है । जब संकर्षण लोहिया और जेपी के बारे में किसी सिनेमा के इंट्रोडक्शन की तरह लिखते हैं । सत्तर का दशक जाने बिना तो आप बिहार का प्राचीन इतिहास भी नहीं जान सकते । पटना जाता हूँ तो मुझे ये बात बेहद हैरान और रोमांचित करती है । बिहार में सत्तर के आंदेलन का अवशेष लिये कई लोग मिल जाते हैं मगर आज़ादी की लड़ाई का इतना शानदार इतिहास होते हुए भी कोई बात नहीं करता । जो सत्तर नहीं समझेगा वो उसके बाद का बिहार नहीं समझ सकता । सत्तर का दशक बिहार के इतिहास में पर्दे पर किसी सलीम जावेद की कहानी की तरह बच्चन जैसे महानायकों के उभरने का दशक है । फ्लाप हिट होते होते कभी लालू चल जाते हैं तो कभी नीतीश ।
ख़ूबसूरत वर्णन है पटना के काफी हाउस का । रेणु, दिनकर,बाबा नागार्जुन इन सबसे उनकी बिहारियत के साथ मुलाक़ात होती है । पढ़ते पढ़ते लगा कि मैंने भी दिनकर को देख चिल्ला दिया हो- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । बाबा नागार्जुन का रात में अंडा लेकर आना और संकर्षण के साथ मिलकर कड़ुआ तेल में पकाना । अच्छी अंग्रेजी में बिहार मिल जाए तो समझिये कि आक्सफोर्ड में दो बिहारी मिल गए । कहीं कहीं रूपक नुमा शब्द यह भी बता रहे हैं कि नेसफिल्ड और रेन एंड मार्टिन पढ़ कर सीखें हैं तो ऐतना तो बनता है । संस्कार हिन्दी का और अभिव्यक्ति अंग्रेज़ी की । इसीलिए इस लिहाज़ से भी किताब को पढ़ना दिलचस्प अनुभव है ।
बहरहाल आज का बिहार फासीवाद की वो समझ नहीं रखता जो सत्तर के दशक के बिहार में बना रहा था । उन किताबों और बहसों के ज़रिये फासीवाद को समझ रहा था । किताबें ख़रीद रहा था । किताबें पढ़ रहा था । वो लड़ाई कमज़ोर हो चुकी है । सलीम जावेद की फ़िल्म का ये वो सीन है जहाँ एक नायक घायल पड़ा है । मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं । बेतहाशा शोर में भगवान के चेहरे पर ग़ज़ब की ख़ामोशी पसरी है । नायक बिल्कुल सिंगल मैन की तरह आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है । क्या होगा पता नहीं । क्लाइमैक्स का सीन है । सीन में कोई और नहीं । सिर्फ एक सिंगल मैन है ।
मैं इस पुस्तक को पढ़ रहा हूँ । पढ़ते हुए देखना सबसे अच्छा तरीक़ा है पढ़ने का । लेखक और उसके पात्र की जीवनी बन पड़ी है । और दोनों के बीच का समय  इतिहास । पढ़ियेगा । पाँच सौ निन्यानबे दाम है । बाटा कंपनी का यह निन्यानबे छाप गया नहीं । जाएगा भी नहीं । खुदरा लेकर जाइयेगा ।

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